पौड़ी गढ़वाल/हरिद्वार, 4 नवंबर। हिमालय की सुरम्य वादियों में आयुर्वेद, औषधीय वनस्पतियों, प्राकृतिक खेती और भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में पतंजलि ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के यमकेश्वर ब्लॉक स्थित मालाग्राम में विकसित किए जा रहे ‘हर्बल वर्ल्ड हिमालय-श्री धन्वंतरि धाम’ में बुधवार को तीन दिवसीय ‘हर्बल कुंभ, जड़ी-बूटी कृषि मेला एवं धन्वंतरि महोत्सव-2026’ का भव्य शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि आने वाले पांच वर्षों में धन्वंतरि धाम की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देगी। यह स्थान केवल उत्तराखंड या भारत ही नहीं, बल्कि विश्व में औषधीय वनस्पतियों, आयुर्वेद, अनुसंधान, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि मालाग्राम के दुर्गम वन क्षेत्र में जिस स्तर का कार्य हुआ है, वह अद्भुत है। प्रकृति, पर्यावरण, परंपरा और परमार्थ के समन्वय से विकसित यह परिसर आने वाले वर्षों में दुनिया के लिए अध्ययन और प्रेरणा का केंद्र बनेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि एक वर्ष के भीतर धन्वंतरि धाम प्रमुख तीर्थ के रूप में विकसित होगा। साथ ही प्रदेश के किसानों को यहां विशेष प्रशिक्षण दिलाने और विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों को अध्ययन के लिए भेजने की बात कही।
पांच वर्षों में दुनिया यहां देखने और सीखने आएगी : धन सिंह रावत
मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि वह पिछले पांच वर्षों से इस परियोजना की प्रगति देख रहे हैं। शुरुआती दौर में जब वह यहां आए थे, तब इस दुर्गम वन क्षेत्र में इतने बड़े प्रकल्प के विकसित होने की संभावनाओं को लेकर उनके मन में भी सवाल थे। लेकिन इस बार यहां पहुंचकर जो परिवर्तन देखा, वह कल्पना से परे है।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष की तुलना में परिसर में व्यापक विकास हुआ है। आचार्य बालकृष्ण के साथ पूरे क्षेत्र का भ्रमण करने के बाद उन्हें विश्वास हो गया है कि आने वाले पांच वर्षों में दुनिया भर से लोग इस स्थान को देखने और यहां से सीखने आएंगे।
मंत्री ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में लगभग दस वर्षों के मंत्री पद के कार्यकाल के दौरान उन्होंने अनेक कठिन कार्य देखे हैं, लेकिन आचार्य बालकृष्ण जिस समर्पण और परिश्रम से इस दुर्गम क्षेत्र में काम कर रहे हैं, वह असाधारण है। प्रकृति, पर्यावरण, परंपरा और परमार्थ का एक साथ संरक्षण एवं संवर्धन करना किसी भगीरथ प्रयास से कम नहीं है।
उन्होंने परिसर में स्थापित विभिन्न देशों के औषधीय वनस्पति विशेषज्ञों और महापुरुषों की प्रतिमाओं की सराहना करते हुए कहा कि यहां 29 देशों की जड़ी-बूटियों और उनसे जुड़ी ज्ञान परंपराओं पर कार्य किया गया है। इससे विद्यार्थियों और शोधार्थियों को विश्व की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों तथा उनके विकास में योगदान देने वाले महान व्यक्तित्वों के बारे में जानने का अवसर मिलेगा।
विश्वस्तरीय नर्सरी और ध्यान केंद्र की सराहना
डॉ. धन सिंह रावत ने धन्वंतरि धाम में विकसित नर्सरी, औषधीय पौधों और ध्यान केंद्र की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि इतने बड़े वन क्षेत्र में ध्यान और अध्यात्म का केंद्र विकसित करना आसान नहीं है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने हिमालय को साधना का केंद्र बनाया था और आज आचार्य बालकृष्ण उसी परंपरा को आधुनिक स्वरूप प्रदान कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि परिसर में लगाए गए लगभग 50 हजार पौधों में से करीब 90 प्रतिशत सुरक्षित हैं। उन्होंने यहां की औषधीय खेती, विशेष रूप से हल्दी की खेती और उससे संबंधित गतिविधियों की भी प्रशंसा की।
भगवान धन्वंतरि की भव्य प्रतिमा का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि यह प्रतिमा और यहां विकसित हो रहा आध्यात्मिक वातावरण धन्वंतरि धाम को विशिष्ट पहचान प्रदान करेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले एक वर्ष में यह स्थान प्रमुख तीर्थ के रूप में विकसित होगा।
उत्तराखंड के किसानों को मिलेगा चार-पांच दिन का प्रशिक्षण
कैबिनेट मंत्री ने कहा कि उत्तराखंड के प्रगतिशील किसानों को धन्वंतरि धाम में चार से पांच दिन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे यहां विकसित औषधीय खेती, कृषि तकनीकों और अनुसंधान गतिविधियों का प्रत्यक्ष अध्ययन कर सकें। उन्होंने विश्वविद्यालयों में शोध कर रहे विद्यार्थियों को भी यहां भेजने की बात कही।
उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों और किसानों से कहा कि वे केवल भाषण सुनने तक सीमित न रहें, बल्कि पूरे परिसर का भ्रमण कर यहां विकसित व्यवस्थाओं, वनस्पतियों और कृषि मॉडल का अध्ययन करें।
व्यापार नहीं, दुनिया को आत्मीयता से जोड़ने का संकल्प : आचार्य बालकृष्ण
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि हर्बल वर्ल्ड हिमालय की परिकल्पना किसी व्यावसायिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को भारतीय ज्ञान, संस्कृति और प्रकृति से आत्मीयता के साथ जोड़ने के संकल्प से की गई है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद हजारों वर्षों से मानव जीवन के कल्याण का आधार रहा है। भारत के ऋषियों और आयुर्वेद मनीषियों ने औषधीय वनस्पतियों के माध्यम से मानवता को जो ज्ञान दिया, उसके संरक्षण और वैश्विक प्रसार की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि 109 खंडों में 50 हजार से अधिक वनस्पतियों का औषधीय दृष्टि से संकलन किया गया है। धन्वंतरि धाम में विश्व की विभिन्न ज्ञान परंपराओं और उन महापुरुषों को भी सम्मान दिया जा रहा है, जिन्होंने औषधीय वनस्पतियों तथा पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि कई ऐसे महान व्यक्तित्व हैं, जिन्हें उनके अपने देशों में भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिला, लेकिन धन्वंतरि धाम में उनके योगदान को वैश्विक पहचान देने का प्रयास किया जा रहा है।
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि लगभग पांच वर्षों के अथक परिश्रम से हिमालय के इस दुर्गम क्षेत्र में व्यापक स्तर पर कार्य किया गया है। परिसर में 50 हजार से अधिक औषधीय पौधे लगाए जा चुके हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों, वनस्पतियों, पर्वतीय भूभाग और हिमालयी जैव विविधता के संरक्षण के साथ यहां अनुसंधान, अध्ययन, ध्यान और पर्यटन की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। यह सैकड़ों लोगों के समर्पण और पुरुषार्थ का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड को हर्बल स्टेट बनाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। हिमालयी क्षेत्र औषधीय वनस्पतियों और जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। धन्वंतरि धाम इस प्राकृतिक संपदा के संरक्षण और उसके वैज्ञानिक उपयोग का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
पहाड़ से पलायन रोकने का आधार बनेगी औषधीय खेती
आचार्य बालकृष्ण ने पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि पहाड़ के लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़ने के लिए विवश नहीं होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि स्थानीय संसाधनों के आधार पर आजीविका और रोजगार के नए अवसर विकसित किए जाएं।
उन्होंने कहा कि धन्वंतरि धाम में किसानों को औषधीय पौधों की खेती, फसल विविधीकरण, मॉडल फार्मिंग और कृषि आधारित उद्यमिता की व्यावहारिक जानकारी दी जाएगी। किसानों को ऐसी फसलों और खेती की तकनीकों से परिचित कराया जाएगा, जिनसे उनकी आमदनी बढ़ सके और पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों का विस्तार हो।
उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे यहां आएं, देखें, समझें और सीखें। यह केवल प्रदर्शनी या मेला नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्त करने और उसे अपने खेतों में लागू करने का अवसर है। यहां आयुर्वेद, विज्ञान, अनुसंधान, संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और साहसिक पर्यटन को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
आचार्य बालकृष्ण ने प्रकृति और अध्यात्म के संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनि हिमालय की गुफाओं, नदियों और कंदराओं में साधना करते थे। प्रकृति के सान्निध्य में मिलने वाली आंतरिक शांति और संतोष का कोई विकल्प नहीं है। धन्वंतरि धाम में आने वाले लोग प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ध्यान, साधना और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं का अनुभव भी कर सकेंगे।
भविष्य में औषधीय अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बनेगा हर्बल कुंभ : राकेश मित्तल
भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के केंद्रीय प्रभारी राकेश मित्तल ने कहा कि भारत में मेलों की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। मेले केवल सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव और परंपराओं के आदान-प्रदान के महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। हर्बल कुंभ इसी परंपरा का आधुनिक और वैज्ञानिक विस्तार है।
उन्होंने कहा कि आने वाले 50 से 200 वर्षों में यह स्थान वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। भविष्य में नई बीमारियों और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के समाधान की खोज में औषधीय वनस्पतियों पर आधारित अनुसंधान की बड़ी भूमिका होगी।
कोरोना महामारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने गिलोय और आयुर्वेद के योगदान संबंधी अपने विचार रखे। उन्होंने आयुर्वेद के संरक्षण, अनुसंधान और प्रचार-प्रसार में स्वामी रामदेव तथा आचार्य बालकृष्ण के प्रयासों की सराहना की।
200 एकड़ में विकसित हो रहा औषधीय वनस्पतियों का अनूठा संसार
लगभग 200 एकड़ में विस्तृत हर्बल वर्ल्ड हिमालय-श्री धन्वंतरि धाम को औषधीय, सुगंधित एवं फलदार वनस्पतियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए विकसित किया जा रहा है। हिमालय की सुरम्य घाटियों और सघन वनों से घिरा यह परिसर पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान, वनस्पति अनुसंधान, जैव विविधता संरक्षण और भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार के लिए समर्पित है।
तीन दिवसीय महोत्सव में 60 से 70 प्रदर्शनी स्टॉल लगाए गए हैं। इनमें औषधीय एवं सुगंधित पौधों, उच्च मूल्य वाली फसलों, प्राकृतिक एवं जैविक खेती, कृषि उपकरणों, पारंपरिक उत्पादों और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।
प्रदर्शनी में ‘धरती का डॉक्टर’ मृदा परीक्षण मोबाइल वैन भी आकर्षण का केंद्र है। इसके माध्यम से किसानों को मिट्टी की जांच और पोषक तत्वों के संतुलित प्रबंधन के महत्व से परिचित कराया जा रहा है।
महोत्सव में मृदा एवं जल संरक्षण, डिजिटल कृषि, कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण एवं विपणन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, मिलेट आधारित उद्योग और ग्रामीण उद्यमिता से संबंधित गतिविधियों को भी विशेष स्थान दिया गया है।
किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और स्वयं सहायता समूहों को अपने उत्पादों के प्रदर्शन एवं विपणन के अवसर उपलब्ध कराए गए हैं। किसानों, वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों और उद्यमियों के बीच संवाद, कार्यशालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कृषि क्षेत्र भ्रमण और क्रेता-विक्रेता सम्मेलनों का आयोजन भी महोत्सव का हिस्सा है।
पतंजलि किसान डायरी सहित चार पुस्तकों का विमोचन
महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर पतंजलि किसान डायरी और हर्बल कुंभ प्रशिक्षण पुस्तिका सहित चार पुस्तकों का विमोचन किया गया। इन प्रकाशनों के माध्यम से किसानों और शोधार्थियों को कृषि एवं औषधीय वनस्पतियों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातःकालीन वैदिक मंत्रोच्चार, संध्योपासना एवं यज्ञ के साथ हुआ। अतिथियों के स्वागत और दीप प्रज्ज्वलन के बाद पतंजलि विश्वविद्यालय के संगीताचार्य चंद्रमोहन मिश्र एवं छात्र-छात्राओं ने संगीतमय प्रस्तुतियां दीं। कार्यक्रम का संचालन पतंजलि अनुसंधान संस्थान के जड़ी-बूटी प्रभाग की प्रभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वेदप्रिया आर्य ने किया।
इस अवसर पर स्थानीय ग्रामीणों, किसान उत्पादक संगठनों, स्वयं सहायता समूहों के प्रतिनिधियों, श्रीमद् दयानंद कन्या गुरुकुल, चोटीपुरा गुरुकुल, अमरोहा, पतंजलि विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के साथ पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक और बड़ी संख्या में अन्य प्रतिभागी उपस्थित रहे। इस दौरान कृषि मेले के स्टॉलों का उद्घाटन आचार्य बालकृष्ण, कैबिनेट मंत्री डॉ धन सिंह रावत सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने की।
अब हर वर्ष होगा हर्बल कुंभ, अगले आयोजन की तारीख घोषित
समारोह के उदघाटन सत्र पर आचार्य बालकृष्ण ने घोषणा की कि अगले वर्ष 25 से 27 अक्टूबर 2027 तक धन्वंतरि धाम में पुनः तीन दिवसीय हर्बल कुंभ, जड़ी-बूटी कृषि मेला एवं धन्वंतरि महोत्सव आयोजित किया जाएगा और अब यह हर साल होगा।
उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में इस आयोजन को और अधिक व्यापक एवं भव्य स्वरूप दिया जाएगा। उनका संकल्प है कि धन्वंतरि धाम दुनिया के लिए आयुर्वेद, औषधीय वनस्पतियों, प्राकृतिक खेती, अनुसंधान और भारतीय ज्ञान परंपरा का ऐसा केंद्र बने, जिसकी पहचान वैश्विक स्तर पर स्थापित हो।